ज्योतिष की भाषा मे साल महीने  दिनांक सबकुछ समझे

  • Posted on January 12, 2022 by We-Astro

ज्योतिष की भाषा मे साल महीने दिनांक सबकुछ समझे,

Date versus दिनांक

सही वाक्य का चयन करें।

१. आज का दिनांक क्या है?

२. आज के दिनांक क्या हैं?

 

इंग्लिश में कहते हैं –

What is your date of birth?

 

यहाँ is का प्रयोग देखकर तो आप प्रथम विकल्प ही चुनेंगे किन्तु ‘दिनांक’ शब्द ‘date’ का “अपूर्ण अनुवाद” है अतः date वाले सारे व्यवहार दिनांक पर लागू नहीं होंगे। सरलता से समझने के लिए निम्नोक्त प्रश्नों को देखें और सही का चयन करें।

१. संख्या २५९ में कितना अंक है?

२. संख्या २५९ में कितने अंक है?

 

निश्चित ही आप द्वितीय विकल्प को चुनेंगे अर्थात् आरम्भ में दिये गये दोनों वाक्यों में से द्वितीय ही सही है। दिनांक में आने वाले अंक एक से अधिक होते हैं अतः बहुवचन का प्रयोग होगा।

 

अब दिनांक का तात्पर्य समझिए।

 

दिनांक वर्षविशेष के दिनविशेष को ज्ञापित करते हैं।

 

यथा आज के दिनांक 25-12-2021 का तात्पर्य है –

2021वें क्रिश्चिअन वर्ष का 360वाँ दिन।

 

लगे हाथ date का “पूर्ण अनुवाद” भी समझिए और वह है – दिन संख्या!

 

यह आप जानते ही हैं कि संख्या में एक से अधिक अंक हो सकते हैं।

 

इसी प्रकार ‘पत्रांक’ भी “letter number” का अपूर्णानुवाद है। पूर्णानुवाद होगा – पत्र संख्या।

 

‘अपूर्णानुवाद’ के अतिरिक्त हिन्दी में ‘मिथ्यानुवाद’ की भी समस्या है। यथा ‘inter’ पूर्वलग्न (prefix) का प्रयोग जिसका मिथ्यानुवाद हिन्दी का ‘अन्तर्’ पूर्वलग्न है। ध्वनि-साम्य के कारण इसका ग्रहण किया गया है। अपूर्णानुवाद और मिथ्यानुवाद के कारणों में ध्वनि-साम्य को अन्यतम कहा जा सकता है। इंग्लिश के inter पूर्वलग्न का तात्पर्य है – अनेक के मध्य होने वाला। अतः international का तात्पर्य हुआ – अनेक nations के मध्य होने वाला। वहीं दूसरी ओर हिन्दी के अन्तर् पूर्वलग्न का तात्पर्य है – के भीतर होने वाला। अतः अन्तर्राष्ट्रीय का तात्पर्य हुआ – राष्ट्र के भीतर होने वाला। “अन्तर्राष्ट्रीय कबड्डी स्पर्धा” में सम्बन्धित राष्ट्र में रहने वाले ही प्रतिभाग करेंगे। वस्तुतः इंग्लिश के inter पूर्वलग्न का पूर्णानुवाद ‘सार्व’ है अतः international का पूर्णानुवाद ‘सार्वराष्ट्रिक’ अथवा ‘सार्वदेशिक’ होगा।

 

मास-विमर्श

 

मास मूलतः चान्द्र होता है। इसके २ प्रकार हैं –

१. नाक्षत्र मास

२. कलामास

 

चन्द्र द्वारा किसी नक्षत्र से चलकर पुनः उसी नक्षत्र में आने तक का समय “नाक्षत्र मास” है जो चन्द्र द्वारा पृथ्वी की एक परिक्रमा का द्योतक है। इसमें २७ से अधिक किन्तु २८ से न्यून सौर दिवसों का समय लगता है। इसी कारण नक्षत्रों की संख्या २७ है अर्थात् चन्द्र प्रतिदिन एक नक्षत्र पार करता है।

 

भचक्र में ग्रह आदि पश्चिम से पूर्व की ओर गतिशील हैं अतः पश्चिम से पूर्व की ओर नक्षत्रक्रम निम्नवत् है –

 

१. अश्विनी, २. भरणी, ३. कृत्तिका, ४. रोहिणी, ५. मृगशिरस्, ६. आर्द्रा, ७. पुनर्वसु, ८. पुष्य, ९. आश्लेषा, १०. मघा, ११. पूर्वा फाल्गुनी, १२. उत्तरा फाल्गुनी, १३. हस्त, १४. चित्रा, १५. स्वाति, १६. विशाखा, १७. अनुराधा, १८. ज्येष्ठा, १९. मूल, २०. पूर्वा आषाढा, २१. उत्तरा आषाढा, २२. श्रवण, २३. धनिष्ठा, २४. शतभिषक्, २५. पूर्वा भाद्रपद, २६. उत्तरा भाद्रपद, २७. रेवती।

 

एक चन्द्रकला से पुनः उसी चन्द्रकला तक का समय कलामास है। कलामास का ज्ञान व व्यवहार नाक्षत्र मास की अपेक्षा प्राचीन है क्योंकि रात्रि में नक्षत्रों की अपेक्षा चन्द्र सहज दृश्य होता है। नक्षत्रों की पहचान बाद में की गई। इसी कारण कहा गया है –

नक्षत्राणामहं शशी। (गीता १०-२१)

मैं नक्षत्रों में चन्द्र हूँ।

 

कलामास के पक्षार्ध नामक चार भाग हैं जिनका आरम्भ क्रमश: अमावास्या, शुक्लाष्टमी, पूर्णिमा व कृष्णाष्टमी से होता है। प्रथम दो पक्षार्धों का समुच्चय आपूर्यमाण पक्ष अथवा शुक्ल पक्ष कहलाता है क्योंकि इसमें चन्द्र का आलोकित भाग क्रमश: बढ़ता जाता है। शेष दोनों का समुच्चय अपक्षीयमाण पक्ष अथवा कृष्ण पक्ष अथवा बहुल पक्ष कहलाता है क्योंकि इसमें चन्द्र का आलोकित भाग क्रमश: घटता जाता है।

 

चन्द्रगोल के आलोकित (शुक्ल) व अनालोकित (कृष्ण) भागों में से जो भी पश्चिम की (दायीं) ओर हो वही पक्ष जानना चाहिए।

 

कृष्ण पक्ष में सूर्यास्त के उपरान्त चन्द्रोदय होता है जबकि शुक्ल पक्ष में सूर्यास्त होने के पहले ही आकाश में चन्द्र उपस्थित होता है और दृश्य भी हो सकता है।

 

कलामासों का नामकरण पूर्णिमा की नक्षत्रीय स्थिति पर आधारित है। पूर्ण चन्द्र जिस नक्षत्र के निकट होता है प्रायः उसी नक्षत्र के नाम वाला कलामास समझना चाहिए। क्रमश: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ व फाल्गुन कलामास होते हैं। कलामासों के नामों के नक्षत्र प्राय: एकान्तर क्रम से (मध्य में एक नक्षत्र छोड़ते हुए) आते हैं क्योंकि कलामास नाक्षत्र मास की अपेक्षा प्राय: २ दिन बड़ा होता है। पूर्णिमा जिस नक्षत्र में होती है उसी नक्षत्र में चन्द्र के पुनः पहुँचने पर नाक्षत्र मास तो पूर्ण हो जाता है किन्तु पूर्णिमा होने में प्रायः २ दिन और लगते हैं। अतः पूर्णिमा के २ दिन बाद (कृष्ण पक्ष की द्वितीया को) चन्द्र जिस नक्षत्र के निकट होता है प्रायः उसी नक्षत्र के नाम वाला अगला कलामास समझना चाहिए।

 

व्यवहार में कलामास के २ रूप हैं – अमान्त व पूर्णिमान्त। अमान्त रूप प्रमुख व प्राचीन है। मलमास व अधिमास हेतु अमान्त रूप का ही प्रयोग होता है। सम्प्रति जिस कलामास में सूर्य का संक्रम (अगली राशि में प्रवेश) नहीं होता उसी को मलमास बनाया जाता है। मलमास से अगला मास अधिमास होता है। मलमास व अधिमास समान नाम वाले होते हैं। नाक्षत्र सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष (१२ कलामास) का समन्वय करने हेतु अधिमास बनाया जाता है। अमा में सूर्य व चन्द्र एक ही नक्षत्र में होते हैं अत: अमान्त कलामास ही अधिमास बनाने हेतु अधिक उपयुक्त है।

 

दक्षिण भारत में अमान्त कलामास का व्यवहार होता है जबकि उत्तर भारत में पूर्णिमान्त का।फलत: उत्तर भारत में कलामास दक्षिण भारत की अपेक्षा एक पक्ष पूर्व ही आरम्भ हो जाता है।

 

प्राचीन काल में कलामास का आरम्भ अमा के उपरान्त प्रथम चन्द्रदर्शन से किया जाता था अर्थात् तब पूर्णिमा को मासमध्य माना जाता था। मासों के चैत्र, वैशाख आदि नक्षत्राधारित नामों का प्रचलन होने पर कुछ स्थानों पर पूर्णिमा को मासमध्य नहीं प्रत्युत मासान्त माना जाने लगा।

कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी से लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तक प्रायः ३ रात्रियों का ‘अदर्शन’ होता है जिसमें चन्द्र के दर्शन नहीं होते। ‘नवचन्द्र’ (new moon) का दर्शन होते ही अदर्शन समाप्त हो जाता है। नवचन्द्र को प्रथम रात्रि मानने पर १४वीं रात्रि में पूर्णिमा होती है जिसमें चन्द्र सूर्य से १८०° पर होता है। सूर्य व चन्द्र का समान अंश पर होना अमा है जो अदर्शन केे मध्य में होती है। अदर्शन में साधना की जाती थी तथा नवचन्द्र होने पर उत्सव मनाया जाता था। सम्प्रति पाश्चात्य ज्योतिषी अमा को ही नवचन्द्र कहने लगे हैं क्योंकि अमाबोधक कोई शब्द उनके पास नहीं है!

 

१३ नाक्षत्र मासों में प्रायः १२ कलामास होते हैं।

 

सौर मास केवल कृत्रिम आयोजन मात्र है और कलामास की अवधि के अनुकरण (नकल) पर आधारित है जिसके ३ प्रकार हैं –

१. राशिमास

२. ऋतुमास

३. अहर्गणीय मास

 

इस प्रकार मुख्यतः ५ प्रकार के मास होते हैं।

 

भचक्र के तारों को राशि नामक १२ तारा-समूहों में विभक्त किया गया है। सूर्य के किसी राशि में आ जाने पर उसी नाम के “नाक्षत्र सौर मास” का आरम्भ होता है जिसे राशिमास भी कहते हैं।

 

एक पूर्णिमा जिस तारे के निकट होती है उससे अगली पूर्णिमा उस तारे से पूर्व के किसी तारे के निकट होगी। पहले तारे से दूसरे तारे तक के क्षेत्र का कोणीय विस्तार ३०° से किञ्चित् न्यून होता है। ऐसे १२ क्षेत्र बनेंगे। यही राशि की आरम्भिक संकल्पना है।

 

पूर्णिमा में चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसके लगभग १८०° दूर का नक्षत्र जिस राशि का भाग होता है उसी नाम का राशिमास चल रहा होता है क्योंकि पूर्णिमा का चन्द्रमा सूर्य से १८०° के अन्तर पर होता है।

 

ऋतुवर्ष के वर्षपाद नामक क्रमश: चार भाग हैं जिनके आरम्भ-बिन्दु हैं —

१‍. उत्तरगोलवासारम्भ (२१ मार्च)

२. उत्तरायणान्त (२१ ज्यून)

३. दक्षिणगोलवासारम्भ (२३ सेप्टेम्बर)

४‍. दक्षिणायनान्त (२२ डिसेम्बर)

 

पुन: वर्षपादों को भी कृत्रिमतया तीन-तीन ऋतुमासों में विभक्त किया गया है जो इस प्रकार हैं—

प्रथम वर्षपाद   ⇒ माधव  शुक्र  शुचि

द्वितीय वर्षपाद ⇒ नभस्  नभस्य  इष

तृतीय वर्षपाद  ⇒ ऊर्ज सहस् सहस्य

चतुर्थ वर्षपाद   ⇒ तपस्  तपस्य  मधु

 

इन ऋतुमासों को युग्म में लेने पर क्रमश: ६ ऋतुएँ होती हैं –

१. मधु-माधव    ⇒ वसन्त

२. शुक्र-शुचि     ⇒ ग्रीष्म

३. नभस्-नभस्य ⇒ वर्षा

४. इष-ऊर्ज       ⇒ शरद्

५. सहस्-सहस्य ⇒ हेमन्त

६. तपस्-तपस्य  ⇒ शिशिर

 

भारतवर्ष में मुख्यत: वसन्त ऋतु के आरम्भ के साथ वर्ष का आरम्भ किया जाता था। अत: मधु मास प्रथम मास था।

 

वर्षपाद ही ऋतुओं के नियामक हैं। अत: ईरान में प्रथम वर्षपाद के आरम्भ के साथ ही वर्ष का आरम्भ किया जाता था। इस प्रकार वहाँ मधु मास नहीं प्रत्युत माधव मास प्रथम ऋतुमास था। भारतवर्ष में भी कुछ स्थानों पर माधव मास के आरम्भ के साथ ही वर्ष का आरम्भ किया जाता था।

 

अहर्गणना (दिनों की संख्या अथवा गिनती) पर आधारित मासों को अहर्गणीय मास कहते हैं। ये मूलत: ऋतुमासों पर आधारित होते हैं क्योंकि इन्हें माधव ऋतुमास से समञ्जित किया जाता है अर्थात् माधव ऋतुमास के साथ ही भारत में दूसरे तथा ईरान में पहले अहर्गणीय मास का आरम्भ होता है। इस प्रकार अहर्गणीय मास ऋतुमास का ही सरलीकृत रूप है।

 

ग्रेगोरिअन कैलेण्डर के मास अहर्गणीय हैं किन्तु उनमें २ दोष हैं–

१. ११ दिन का विलम्ब है अर्थात् २१ मार्च का दिनांक १ ऍप्रिल होना चाहिए।

२. ऋतुवर्ष में औसत ऋतुमासावधि ३०·५ दिन होने के कारण अहर्गणीय मास ३० दिन से छोटा नहीं होना चाहिए तथा न्यूनातिन्यून ऐसे ६ मास अवश्य होने चाहिए किन्तु ग्रेगोरिअन कैलेण्डर में ३० दिन के केवल ४ मास हैं तथा एक मास २८-२९ दिन का है।

 

ऋतुमासों व अहर्गणीय मासों की तुलना करें –

 

१. मधु          = मार्च

२. माधव       = ऍप्रिल 

३. शुक्र         = मे     

४. शुचि         = ज्यून   

५. नभस्       = जुलाइ 

६. नभस्य      = ऑगस्ट 

७. इष           = सेप्टेम्बर

८. ऊर्ज         = ऑक्टोबर 

९. सहस्        = नोवेम्बर   

१०. सहस्य    = डिसेम्बर   

११. तपस्      = जेन्युअरि   

१२. तपस्य     = फेब्रुअरि

 

मधु ऋतुमास के सहवर्ती अहर्गणीय मास मार्च को प्रथम अहर्गणीय मास मानने पर सेप्टेम्बर, ऑक्टोबर, नोवेम्बर व डिसेम्बर क्रमशः ७वें, ८वें, ९वें व १०वें क्रमांक पर आते हैं जिससे इनके नामों के संख्यावाची पूर्वलग्नों (prefixes) की सार्थकता सिद्ध होती है।

     

भारत में अहर्गणीय मासों की ४ व्यवस्थाएँ थीं –

 

प्रथम ⇒ ३० दिन के ११ मास तथा १२वाँ मास ३५ दिन का। प्रति चौथे वर्ष में १२वाँ मास ३६ दिन का। यह प्राचीनतम व्यवस्था थी। मिश्र में भी यही व्यवस्था प्रचलित थी।

 

द्वितीय ⇒ पहले १० मास ३० दिन के, ११वाँ मास ३३ दिन का तथा १२वाँ मास ३२ दिन का। प्रति चौथे वर्ष में १२वाँ मास ३३ दिन का।

 

तृतीय ⇒ पहले ५ मास ३० दिन के, छठा मास ३३ दिन का तदुपरान्त पुन: ५ मास ३० दिन के तथा अन्तिम १२वाँ मास ३२ दिन का। प्रति चौथे वर्ष में १२वाँ मास ३३ दिन का।

 

चतुर्थ ⇒ पहला, तीसरा, ५वाँ, ७वाँ, ९ वाँ, ११वाँ व १२वाँ मास ३० दिन का तथा दूसरा, चौथा, छठा, ८वाँ व १०वाँ मास ३१ दिन का। प्रति चौथे वर्ष में १२वाँ मास ३१ दिन का। ३०·५ दिनों का सौर मास माने जाने के कारण इस व्यवस्था को ग्रहण किया गया था। जूलिअन व ग्रेगोरिअन कैलेण्डरों में इसी का बिगड़ा हुआ रूप प्रयुक्त है।

 

२२ मार्च १९५७ ख्रीष्टाब्द में भारत में एक नवीन अहर्गणीय मास-व्यवस्था का सूत्रपात हुआ –

 

पञ्चम ⇒ दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवाँ व छठा मास ३१ दिन का तथा अन्य मास ३० दिन के। प्रति चौथे वर्ष में प्रथम मास ३१ दिन का।

 

पञ्चम व्यवस्था में एक दोष रह गया है कि इसमें मासों का नामकरण मधु, माधव आदि न करके चैत्र, वैशाख आदि ही कर दिया गया है जिससे इन मासों से कलामासों का भ्रम हो जाता है।

 

२१ मार्च से २० ज्यून तक ९२ दिन होते हैं।

अतः औसत ऋतुमासावधि = ३०·६६ दिन

 

२१ ज्यून से २२ सेप्टेम्बर तक ९४ दिन होते हैं।

अतः औसत ऋतुमासावधि = ३१·३३ दिन

 

२३ सेप्टेम्बर से २१ डिसेम्बर तक ९० दिन होते हैं।

अतः औसत ऋतुमासावधि = ३० दिन

 

२२ डिसेम्बर से २० मार्च तक ८९ दिन होते हैं।

अतः औसत ऋतुमासावधि = २९·६६ दिन

 

प्रथम व द्वितीय वर्षपादों को मिलाने से बने वर्षार्ध में १८६ दिन हैं। अत: इस वर्षार्ध में औसत ऋतुमासावधि ३१ दिन है। इसी कारण भारत की पञ्चम अहर्गणीय मास-व्यवस्था में दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें व छठे मास ३१ दिन के हैं।

 

§ पाँचों में से कौन-सी अहर्गणीय मास-व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ है?

 

प्रथम व द्वितीय अहर्गणीय मास-व्यवस्थाओं में पहली तीन तिमाही ९०-९० दिन की होती हैं तथा चौथी तिमाही ९५ दिन की होती है अत: वर्षपादों की अवधि की गणना करना सरल होता है।

 

यदि वसन्त संपात (सम्प्रति २१ मार्च) का दिनांक १ एप्रिल कर दिया जाय और मार्च प्रथम मास हो तो प्रथम व द्वितीय अहर्गणीय मास-व्यवस्थाओं में वर्षपादों के आरम्भ-दिवसों के दिनांक निम्नवत् होंगे।

 

उत्तरगोलारम्भ    १ एप्रिल

उत्तरायणान्त      ३ जुलाइ

दक्षिणगोलारम्भ  ७ ऑक्टोबर

दक्षिणायनान्त     ७ जेन्युअरि

 

यह अविस्मरणीय है कि चारों वर्षपादों में से किसी एक के आरम्भ-दिवस का दिनांक ही अपरिवर्तनीय बनाया जा सकता है।

 

प्रथम व द्वितीय वर्षपादों के प्रथम दिनांकों को देखें।

३-१ = २

अत: अन्तर = २+९० = ९२ दिन

 

द्वितीय व तृतीय वर्षपादों के प्रथम दिनांकों को देखें।

७-३ = ४

अत: अन्तर = ४+९० = ९४ दिन

 

तृतीय व चतुर्थ वर्षपादों के प्रथम दिनांकों को देखें।

७-७ = ०

अत: अन्तर = ०+९० = ९० दिन

 

चतुर्थ व प्रथम वर्षपादों के प्रथम दिनांकों को देखें।

१-७ = -६

अत: अन्तर = -६+९५ = ८९ दिन

 

अत: प्रथम व द्वितीय अहर्गणीय मास-व्यवस्थाएँ ही अहर्गणन के लिए अधिक उपयुक्त हैं और उन दोनों में भी प्रथम व्यवस्था सर्वथा उपयुक्त व श्रेष्ठ है क्योंकि इस व्यवस्था में ३०-३० दिन के ११ मास होने के कारण अहर्गणन सरलतम है अर्थात् किन्हीं दो दिनांकों के मध्यवर्ती दिनान्तर की गणना सरलतम है।

 

प्रथम अहर्गणीय मास-व्यवस्था की एक अन्य विशेषता यह है कि यह कलामासों से भी समन्वय रखती है। कलामास की अवधि लगभग २९·५ दिन है। अत: ३० दिन के अहर्गणीय मास होने पर उन मासों के समान दिनांकों पर प्राय: समान तिथि पड़ेगी जिससे किसी भी दिनांक पर पड़ने वाली तिथि का अनुमान करना अति सरल होगा।

 

अब सहज प्रश्न है कि

यदि प्रथम अहर्गणीय मास-व्यवस्था ही उत्तम थी तो द्वितीय व्यवस्था और तदुपरान्त अन्य व्यवस्थाएँ क्यों बनाईं गईं?

इस प्रश्न का उत्तर अति रोचक है जो मासिक वेतन में निहित है!

प्रसिद्ध उक्तियाँ हैं –

राजा कालस्य कारणम्। (महाभारत १२-६९-७९) तथा

राजा हि युगमुच्यते। (मनुस्मृति ९-३०१)

अर्थात् शासन में व्यवहृत काल ही लोक में व्यवहृत हो जाता है।

 

परम्परया कलामास की समाप्ति पर मासिक वेतन दिया जाता था। इस प्रकार ५ वर्ष में ६२ मासिक वेतन दिए जाते थे। कुछ राजाओं ने अहर्गणीय मास की समाप्ति पर वेतन देने का विचार किया। इससे ५ वर्ष में ६० मासिक वेतन ही देने पड़ते थे जिससे ५ वर्ष में २ मासिक वेतनों की बचत होने लगी किन्तु कर्मचारियों ने इस पक्ष को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उन्हें केवल इस बात से आपत्ति थी कि १२वें मास में उन्हें ५ दिन के विलम्ब से वेतन मिल रहा था। इस आपत्ति को दूर करने हेतु इन ५ दिनों को अन्य मासों में वितरित करने के प्रयास किए गए किन्तु इन प्रयासों से ज्योतिषी रुष्ट हो गए क्योंकि ये प्रयास अहर्गणन की मूल भावना के विरुद्ध थे। यह रोष इतना बढ़ गया कि अहर्गणीय मास-व्यवस्था त्याग दी गई और मासिक वेतन पुन: कलामास के अनुसार दिया जाने लगा। ब्रिटिश शासन ने भारत में अहर्गणीय मासिक वेतन का पुन: आरम्भ किया।

 

मिश्र में भी कर्मचारियों को यही आपत्ति थी कि १२वें मास का वेतन ५ दिन के विलम्ब से प्राप्त होता है। वहाँ इसका बड़ा ही रोचक समाधान प्रस्तुत किया गया। कर्मचारियों को १२वें मास के ३५वें दिन के स्थान पर ३०वें दिन ही वेतन दे दिया जाता था और ५ दिन का अवकाश भी प्रदान किया जाता था जो चौथे वर्ष ६ दिन का हो जाता था। यह व्यवस्था सहर्ष स्वीकार कर ली गई। इस प्रकार भारत में तो अहर्गणीय मास-व्यवस्था से छेड़-छाड़ के कारण इसका व्यवहार त्याग दिया गया जबकि मिश्र में ऐसी कोई छेड़-छाड़ नहीं हुई फलत: वहाँ इसका व्यवहार अक्षुण्ण बना रहा।